बिहार विधानसभा चुनाव में जीत के बाद समर्थकों का अभिवादन स्वीकार करते नीतीश कुमार
जिसके सामने हार का खतरा हो, उसे गठबंधन बना लेना चाहिएः चाणक्य
अमित शाह के उलट नीतीश कुमार और लालू यादव प्राचीन राजनैतिक गुरु चाणक्य या उनके राजनैतिक दर्शन के प्रशंसक नहीं माने जाते. सो, मई 2014 की गर्मियों में एक सुबह जब लालू ने अपनी बेटी मीसा के मनाने पर सियासी प्रतिद्वंद्वी अपने पुराने दोस्त नीतीश को फोन पर अपने मन की बात कह डाली कि कैसे उनके अलग-अलग रहने का लाभ मोदी लहर को मिला और दोनों का सियासी भविष्य उसमें डूब गया, तो इस बात को समझने के लिए उन्हें चाणक्य की सूक्ति की जरूरत नहीं पड़ी.
उनके सामने हार का संकट नहीं था बल्कि वे हार का कड़ा स्वाद चख चुके थे. उन्हें ऐसा लग रहा था कि ऐसी और कड़वी खुराकें अभी बाकी हैं. गठबंधन बनाना वक्त की नजाकत थी, लेकिन यह काम जितना आसान दिखता था, उतना वास्तव में था नहीं. बिहार जैसे भीषण सियासी प्रतिद्वंद्विता वाले राज्य में निजी और राजनैतिक मतभेदों को पाटना बहुत बड़ा काम जान पड़ता था. इसका श्रेय इन्हीं दोनों नेताओं को जाता है कि इन्होंने अलग-अलग डूबने की बजाए एक-दूसरे का हाथ थाम कर साथ तैरने का फैसला किया.
शायद यही वजह रही कि रविवार 8 नवंबर को नीतीश उन करोड़ों लोगों में शामिल नहीं थे जो तड़के उठकर बिहार के लोकतांत्रिक ड्रामे को देखने के लिए टीवी खोलकर बैठ गए थे. इसकी बजाए नीतीश ने कुछ और देर तक सोए रहना मुनासिब समझा, बावजूद इसके कि वे तड़के ही उठने के आदी हैं. वे दिल से जानते थे कि पिछले 18 महीनों में उन्होंने लालू के साथ मिलकर जो कठिन मैराथन दौड़ लगाई है, उसकी मेहनत बेकार नहीं जाने वाली है. वे पिछले तीन दिन लगातार जमीनी स्तर से फीडबैक लेने में व्यस्त थे और कहीं से कुछ भी नकारात्मक नहीं था. वे सोकर उठने के बाद करीब नौ बजे कुछ दोस्तों के साथ भुना हुआ चूड़ा और हर्बल चाय लेकर टीवी के सामने बैठ गए. इसके बाद उनके पास फोन कॉल की बाढ़ आ गई. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का फोन साढ़े दस बजे के करीब आया. मोदी ने नीतीश को कामयाबी के लिए बधाई दी और कहा कि यह जनादेश उनके काम में लोगों के भरोसे का परिचायक है. उनकी जीत जितनी मीठी थी, उसके मुकाबले उनका प्रतिशोध कहीं ज्यादा मीठा साबित हुआ.
यह वही कमरा था जिसमें बैठकर नीतीश ने पिछले कुछ महीनों के दौरान मोदी के तमाम भाषण टीवी पर देखे थे और उसकी काट खोजने की रणनीति तैयार की थी.
इन महीनों के दौरान मोदी समूचे बिहार में घूम-घूमकर 30 रैलियों को संबोधित कर चुके थे जो एक प्रधानमंत्री के लिए अप्रत्याशित था. नीतीश ने 230 और लालू ने 251 सभाओं को संबोधित किया. फैसले के दिन हालांकि इस संख्या की कोई अहमियत नहीं थी. असली मतलब तो नीतीश के जनता दल (यू) और लालू के राष्ट्रीय जनता दल के मिले-जुले आंकड़े से था, जिसका कांटा 243 सीटों वाली विधानसभा में 178 पर आकर थमा. साढ़े बारह बजे के करीब नीतीश का फोन बजा तो दूसरी ओर लालू थे. दोनों ने इस शानदार प्रदर्शन पर एक-दूसरे को बधाई दी. इन्होंने मिलकर जो हासिल किया था, वह कुछ महीने पहले तकरीबन नामुमकिन जान पड़ता था. इनके महागठबंधन ने बीजेपी को धूल चटा दी थी.
बिहार विधानसभा चुनाव 2015 में महागठबंधन की जीत
वापसी की पटकथा
ग्यारह महीने पहले नीतीश जब सर्द दिसंबर की एक सुबह दिल्ली आए थे, उस वक्त अगर किसी ने जीत की संभावना की भविष्यवाणी कर दी होती, तो वे खुद इसे एक भद्दा मजाक समझ कर खारिज कर देते. यह सच है कि आरजेडी और कांग्रेस के साथ उनकी पार्टी के गठबंधन के बाद अगस्त 2014 के उप-चुनावों में उक्वमीद की एक किरण दिखाई दी थी. इन पार्टियों को मिले वोट भी पर्याप्त थे. अति पिछड़ा, महादलित और मुसलमानों के समर्थन से जेडी(यू) को लोकसभा चुनावों में 16.04 फीसदी वोट मिले थे. यादव और मुसलमान के मिश्रण से आरजेडी को 20.46 फीसदी वोट मिले थे जबकि कांग्रेस ने 8.56 वोट हासिल किए. इन्हें मिला दिया जाए तो कुल 45.06 फीसदी वोट बनते हैं जो कि बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए के 36.48 फीसदी वोटों से ज्यादा हैं. इसके बावजूद नीतीश अच्छे से जानते थे कि चुनाव सिर्फ गणित का खेल नहीं होता.
इसके अलावा, लोकसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन के बाद भावनात्मक कदम उठाते हुए उन्होंने इस्तीफा देकर महादलित जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बना दिया, यह कदम भी पलटवार करने लगा था. मांझी एक के बाद दूसरे विवाद को जन्म देते जा रहे थे. नीतीश के सुशासन का रिकॉर्ड छीजता जा रहा था, क्योंकि भ्रष्टाचार ने उसकी जगह ले ली थी और लोगों का मोहभंग होता जा रहा था. समस्या यह थी कि चुनाव बमुश्किल दस महीने दूर था. लोकसभा में हार के बाद नीतीश पूरे राज्य में घूम-घूमकर पार्टी के कार्यकर्ताओं से मिले थे और वे जानते थे कि उनकी पार्टी का भविष्य खत्म होने नहीं जा रहा था. इसके बावजूद काफी कुछ किया जाना अभी बाकी था. दूसरी ओर हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड में लगातार मिली जीत ने बीजेपी के उभार को अपराजेय स्थिति में ला दिया था.
इसीलिए दिसंबर की एक सुबह जब नीतीश दिल्ली में 37 साल के एक युवक प्रशांत किशोर से मिलने आए, उस वक्त उनकी उम्मीदें राजधानी के सूरज की तरह मद्धिम थीं. किशोर संयुक्त राष्ट्र में एक स्वास्थ्यकर्मी थे जिन्हें लोकसभा चुनावों में मोदी की शानदार जीत का कुछ श्रेय दिया जा सकता है. किशोर मोदी के चहेते थे जिन्होंने उन्हें 7, रेसकोर्स तक पहुंचाने के लिए एक नए चुनाव प्रचार प्रारूप को गढ़ा था जो अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव की तर्ज पर था. अक्तूबर 2014 में किशोर के अमित शाह से संबंध बिगड़ गए थे और वे जेडी(यू) के राज्यसभा सांसद पवन के. वर्मा के संपर्क में थे. उन्होंने नीतीश के साथ काम करने की इच्छा जाहिर की थी. वर्मा ने इस नौजवान के बारे में नीतीश को बहुत प्रभावशाली ढंग से बताया था जिसके बाद नीतीश उनसे मिलने को राजी हो गए थे.
किशोर ने नीतीश को सलाह दी कि वे दोबारा मुख्यमंत्री पद पर लौट जाएं. यह काम जितनी जल्दी हो सके, बेहतर होगा. माना जाता है कि नीतीश ने भले ही इस पर तुरंत कोई प्रतिक्रिया न दी हो, लेकिन वे उनकी बात से सहमत थे. नीतीश के शासन के बारे में किशोर ने पहले से थोड़ा अध्ययन कर रखा था. वे इस बात से काफी प्रभावित थे कि सिर्फ तीन फीसदी वोट वाले छोटे-से कुर्मी समुदाय से आने वाला एक मुख्यमंत्री आखिर कैसे जातिवाद से ग्रस्त बिहार के सभी तबकों के बीच बराबर का भरोसा बनाए हुए है. नीतीश की साख थी, उनका सुशासन का अच्छा रिकॉर्ड था और अच्छा प्रदर्शन करने वाले एक नेता की उनकी छवि कायम थी. उनकी संतुलित शक्चिसयत और राजनैतिक रूप से सधा हुआ आचरण उन्हें अतिरिक्त लाभ देता था. बीजेपी ने लोकसभा चुनाव में भले ही समूचे बिहार पर कब्जा कर लिया था, लेकिन करीब 65 फीसदी जनता ने तब भी उसे वोट नहीं दिया था और किशोर की निगाह में नीतीश के लिए यहीं सबसे बड़ा अवसर मौजूद था.
नीतीश के दोबारा मुख्यमंत्री बनने के फैसले ने बिहार के सियासी खेल को तो बदल दिया, लेकिन मांझी को हटाना इतना आसान नहीं था क्योंकि वे अड़ गए और जेडी (यू) के भीतर बगावत हो गई. महादलित वोटों पर नजर गड़ाए बीजेपी ने इस संकट का लाभ उठाया. नीतीश को मुख्यमंत्री पद पर वापस आते-आते फरवरी आ गई. उनके पास अब बीजेपी और मोदी की ताकत से लोहा लेने की तैयारी करने के लिए महज सात महीने थे. किशोर इतने समय को पर्याप्त मानकर चल रहे थे. मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार नीतीश को ही होना था, लिहाजा मांझी के किए-धरे को उन्हें दुरुस्त भी करना था और यह दिखाना भी था कि चीजें उनके नियंत्रण में हैं. बीजेपी ने सबसे बड़ी गलती मांझी को साथ लेकर कर दी क्योंकि यहीं से उसकी पटकथा बदल गई&अब बीजेपी सुशासन की जगह पिछड़ा की राजनैतिक नाव पर सवार हो चुकी थी. बिहार के लोग जानते थे कि महादलित की श्रेणी तो दरअसल नीतीश की बनाई हुई थी, जिसे उन्होंने तमाम सरकारी लाभ से नवाजा भी है. इसीलिए 8 नवंबर को आए परिणाम दिखाते हैं कि दलितों और महादलितों ने वाकई नीतीश को वोट दिया है.
नीतीश कुमार और लालू यादवपहली चाल का फायदा
मार्च से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार रंग में आ गए. वे जानते थे कि सड़कों और शिक्षा की ही तरह बिजली भी सामान्य जीवन को प्रभावित करती है, सो उन्होंने सबसे पहले इस क्षेत्र को पकड़ा. काफी जल्द कार्रवाई की गई और पारेषण क्षमता 1,000 मेगावॉट से ज्यादा बढ़ गई जबकि राज्य में 20,000 से ज्यादा जले हुए ट्रांसफॉर्मरों को बदल दिया गया. बरसों से वंचित रहे बिहार जैसे राज्य में इस पहल ने बड़ा फर्क ला दिया.
जून में नीतीश के साथ किशोर के आ जाने से चीजों को रफ्तार मिली और चुनावी रणनीति के मामले में पहलकदमी करने का शुरुआती लाभ नीतीश को मिला. बीजेपी ने अपना चुनाव प्रचार अभियान शुरू करने में इस आशंका के कारण देरी कर दी कि कहीं बीच मे ही उसकी लय न टूट जाए. वहीं किशोर और उनकी टीम ने जून में ही बढ़ चला बिहार-बिहार@2025 नामक अभियान शुरू कर दिया. यह कार्यक्रम भले सरकारी था, लेकिन इसमें 10,000 से ज्यादा स्वैच्छिक कार्यकर्ताओं को लगाया गया था जो बिहार के 40,000 से ज्यादा गांवों में जा-जाकर नीतीश सरकार की उपलब्धियों को रेखांकित कर रहे थे और लोगों से राय ले रहे थे कि वे अगले दस साल में क्या चाहते हैं. अमित शाह ने 16 जुलाई को जब बीजेपी के चुनाव प्रचार वाहन का अनावरण किया, तब तक नीतीश को राज्य भर से फीडबैक प्राप्त हो चुका था जिसकी मदद से वे अपने प्रचार अभियान को और बेहतर तरीके से गढ़ पाने में सक्षम हो पाए.
किशोर ने एक और शुरुआती काम यह किया कि उन्होंने पटना और बिहार के बड़े शहरों के सभी अहम मार्गों पर लगे तमाम बिलबोर्ड और होर्डिंग खरीद डाले. कुछ ही दिनों में नीतीश और लालू की तस्वीरों वाले लाल और सुनहरे बिलबोर्ड दिखाई देने लगे. प्रत्याशियों के नाम घोषित होने के बाद उनकी तस्वीरों वाले नए बिलबोर्ड भी लगा दिए गए. इसका नतीजा यह हुआ कि लोगों ने समय से पहले ही चुनाव में दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी.
किशोर को सिर्फ पहली चाल का फायदा नहीं मिला. नीतीश के करीबी जेडी (यू) के एक नेता बताते हैं कि उनके लगाए होर्डिंगों से “नितीश के प्रत्याशियों में भी मनोवैज्ञानिक बदलाव देखने को मिला. बिना काडर वाली एक पस्तहिम्मत पार्टी के कार्यकर्ता अचानक खुद को गंभीरता से लेने लगे और लोग भी गंभीर हो गए.” ऐसे कई कदमों से हौसला बढ़ता गया और आखिरकार 30 अगस्त को पटना के गांधी मैदान में महागठबंधन की विशाल रैली में पूरा बिहार ही उमड़ आया.
बिहार चुनाव 2015 में गड़बड़ा गया बीजेपी का जाति गणितअतीत से मुक्ति
नीतीश के लिए मांझी अगर खीझ पैदा करने वाले एक तत्व रहे जिन्होंने उनका कुछ श्रम और वक्त जाया कर डाला, तो लालू उनके लिए सिरदर्द साबित हो सकते थे. नीतीश व्यवस्थित और नपे-तुले इंसान हैं जबकि लालू उनके ठीक उलट हैं. इन दोनों की शैली, प्राथमिकताएं, सरोकार और राजनीति बिल्कुल अलहदा हैं. नीतीश की सारी छवि सुशासन के सहारे बनी थी जबकि लालू अपने कंधे पर अपना वोट बैंक लादकर चलने वाले नेता थे. जाहिर है, लालू से अचानक तालमेल बैठा लेना नीतीश की सामर्थ्य में ही नहीं था. एक से ज्यादा मौकों पर वे लालू के साथ मंच साझा नहीं कर सके और उन्होंने यहां तक कह दिया कि वे दबाव में काम नहीं कर सकते.
दोनों के बीच खुलकर बयानबाजी हुई. लालू ने जब 8 जून को नीतीश को गठबंधन के मुख्यमंत्री के चेहरे के बतौर स्वीकार किया था, तो उन्होंने कहा था कि वे जहर पीने को तैयार हैं. उधर नीतीश 13 जुलाई को लालू की इफ्तार पार्टी में जाने की बजाए दिल्ली में सोनिया गांधी की पार्टी में चले गए. दोनों नेता 20 जुलाई को जब पूर्व मुख्यमंत्री एस.एन. सिन्हा के जन्म-शताब्दी समारोह में शामिल होने गए, तब लालू ने 45 मिनट के संबोधन में कम से कम सात बार इस बात का जिक्र किया कि बिहार के मुख्यमंत्री के पीछे उनका हाथ है. नीतीश ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और उदासीन बने रहे. एक दिन बाद उन्होंने ट्वीट करके अपनी तुलना चंदन के पेड़ से की जो अपने इर्दगिर्द लिपटे जहरीले सांपों से बेअसर रहता है. इस समय तक एकदम यह लगने लगा था कि गठबंधन टूट जाएगा. तभी नीतीश चुपचाप एक दिन लालू के घर गए और दोनों ने करीब घंटा भर साथ में बिताया. इसके बाद दोनों को सार्वजनिक तौर पर एक-दूसरे के खिलाफ बयान देते कभी नहीं पाया गया.
सीटों के बंटवारे पर जब दोनों साथ आए तो गठबंधन मजबूत दिखने लगा. इसमें नीतीश के सुशासन की साख भी थी और लालू का ठोस वोट बैंक भी. नीतीश का सबसे बड़ा दांव कांग्रेस को 41 सीटें देना था जबकि उसके सिर्फ पांच विधायक थे. उस वक्त यह रणनीतिक गलती जान पड़ रही थी, लेकिन अनजाने में इसका नतीजा यह हुआ कि राज्य के 17 फीसदी मुस्लिम मतदाता महागठबंधन के साथ मजबूती से खड़े हो गए.
जो नुस्खे आज नायाब दिख रहे हैं वे बहुत सहज थेः लालू के सामाजिक न्याय के पलड़े को नीतीश के आजमाए हुए सुशासन के पलड़े के साथ बराबर तौला जाना था. दोनों का ही उद्देश्य गरीबों और वंचितों को सशक्त करना था. महिलाओं को एक तबके के बतौर विशेष अहमियत दी जानी थी. इसके अलावा “बिहारी बनाम बाहरी” का जुमला तो सबके लिए था ही.
पटना स्थित एशियन डेवलपमेंट रिसर्च इंस्टिट्यूट के शैबाल गुप्ता कहते हैं कि बिहार में सड़क, बिजली और बुनियादी ढांचे के विकास के संदर्भ में नीतीश ने जाति/वर्ग निरपेक्ष लाभ देने का काम किया है. वे कहते हैं, “दूसरी ओर लालू राज्य में पिछड़ों के उभार के प्रतीक रहे हैं. सचाई यह है कि आप पिछड़ों को संगठित किए बगैर सांप्रदायीकरण से नहीं लड़ सकते. इसलिए नीतीश और लालू को मिलकर नब्बे के दशक की शुरुआत वाली मंडल-कमंडल की राजनीति को दोबारा जिंदा करना ही था.”
एनडीए के घटक दल जहां सीटों के बंटवारे पर लड़ते-झगड़ते रहे, वहीं नीतीश ने लालू और कांग्रेस के साथ चुपचाप यह सौदा कर लिया. एक बार में इसकी अंतिम घोषणा कर दी गई जिसने यह आभास दिया कि गठबंधन सशक्त है. यह काम आसान नहीं था. पिछली विधानसभा में 115 सीटें होने के बावजूद नीतीश ने न केवल 101 सीटों पर लडऩे का फैसला किया बल्कि लालू की झोली में जेडी (यू) की दो दर्जन से ज्यादा सीटें डाल दीं. इसके बदले में लालू से उन्हें सिर्फ एक सीट मिली. यह बात अलग है कि जेडी (यू) के कई प्रत्याशियों को कांग्रेस में जगह मिल गई.
नीतीश की एक और रणनीतिक चाल यह तय करने में रही कि वे और लालू एक-दूसरे के प्रत्याशियों के लिए घनघोर प्रचार करेंगे. इन्होंने कांग्रेसी प्रत्याशियों के लिए भी प्रचार सभाएं कीं और यह संदेश पहुंचाया कि गठबंधन मजबूत है.
नीतीश की शांत भंगिमा को लोगों का समर्थन मिला. वे बीजेपी के तीखे, तीव्र, मारक और विभाजक वार से विचलित नहीं हुए. नीतीश ने हमला भी किया तो उन्होंने मोदी के अधूरे वादों पर ही सवाल उठाया. महागठबंधन ने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण की समीक्षा संबंधी बयान को भी ले उडऩे में देरी नहीं की. किशोर ने आरक्षण खत्म करने संबंधी बीजेपी की योजना पर 20 लाख से ज्यादा संदेश व्हॉट्सऐप पर भेजे. इसके अलावा उन्होंने यह आश्वस्त किया कि लालू और नीतीश की हर रैली में बड़ी संख्या में ऐसे पर्चे बांटे जाएं जिन पर आक्रामक संदेश छपे हों. उन्होंने यह भी तय किया कि मोदी और अमित शाह की हर रैली के बाद या तो लालू या फिर नीतीश 24 से 48 घंटे के भीतर पड़ोस में ही एक रैली करेंगे. विचार यह था कि मोदी और शाह के बयानों की काट लोगों के सामने रखी जा सके. मोदी के लिए “जुमला बाबू” जैसे दिलचस्प नाम भी गढ़े गए.
बिहार के युवाओं का आदर्श
नीतीश जान रहे थे कि मोदी अपनी चुनाव सभाओं में भारी भीड़ खींच रहे थे और उनके वादों पर ताली बजाने वाले ज्यादातर युवा मतदाता ही थे. उन्हें रंगीन टीवी या स्कूटी देने के बीजेपी के वादे नीतीश के अपने विजन दस्तावेज के सामने निरर्थक साबित हुए. नीतीश की सभाओं में आए युवा जोर से ताली बजाते थे जब वे उन्हें निरूशुल्क अंग्रेजी बोलने के प्रशिक्षण का वादा करते थे. बिहार की 31 फीसदी आबादी 30 साल से नीचे की उम्र की है और नीतीश इसकी नब्ज को समझते थे.
बिहार की 245 सीटों में प्रत्येक में औसतन 85,000 मतदाता 30 साल से नीचे के हैं. लोकसभा का चुनाव जेडी (यू), सीपीआइ, कांग्रेस-आरजेडी और एनडीए के मैदान में होने से तितरफा था. इस बार के चुनाव में पूरी तरह ध्रुवीकरण को अंजाम दिया गया था. उसके बावजूद नीतीश को सबसे ज्यादा समर्थन युवाओं की ओर ही मिला. इन युवाओं के अलावा बिहार में 18 से 19 साल के बीच पहली बार मतदान करने वाले करीब 25 लाख मतदाता भी थे. इन मतदाताओं के जन्म से कम से कम छह साल पहले ही मंडल की लहर में हिंदी पट्टी की राजनीति का कायाकल्प हो चुका था, लिहाजा इनकी स्मृति में लालू-राबड़ी की आरजेडी सरकार का दौर नदारद था. इसीलिए जंगलराज के आरोपों से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ा. इस तबके की लड़कियां उस वक्त स्कूल में पढ़ती थीं जब नीतीश ने मुख्यमंत्री साइकिल योजना शुरू की थी. उन्होंने नीतीश को जमकर वोट दिया.
आज नीतीश जब बिहार में अपनी सरकार का नया कार्यकाल शुरू करने जा रहे हैं, तो उन्हें इस जीत तक पहुंचाने वाली अपनी कठिन और कांटों भरी राह को याद रखना होगा और उन विविध समूहों को भी, जिन्होंने उनका लगातार साथ दिया है. सत्ता के इस खेल में उतार-चढ़ाव आएंगे जिनसे निबटने के लिए उन्हें और लालू को वह कौशल हमेशा याद रखना होगा जिसकी मदद से वे एक-दूसरे से और एनडीए के लगाए तमाम आरोपों से निबट सके हैं. यह इन दिग्गजों के ऊपर है कि वे इस जनादेश की सुरक्षा करते हुए उसे और सशक्त बनाते हैं या फिर अपनी अदूरदर्शिता से इसे नुक्सान पहुंचाते हैं. नीतीश को इस बात का एहसास है, यह इंडिया टुडे को कही उनकी इस बात से जाहिर होता है, “यह जनता का जनादेश है, हम झुककर स्वीकार करते हैं. मुझे बिहार को विकास के अगले पायदान तक ले जाने के लिए मेहनत करनी होगी.” फिलहाल तो वे और लालू इस महाजीत का जश्न मनाने की मोहलत ले ही सकते हैं.
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