सॉफ़्ट-टारगेट' क्यों है पठानकोट-जम्मू हाइवे?
भारत के पठानकोट शहर में वायुसेना एयरबेस पर हुए चरमपंथी हमले ने फिर से इलाक़े को सुर्ख़ियों में ला दिया है.
महीनों पहले यहां से सटे गुरदासपुर ज़िले में दिन-दहाड़े हुए चरमपंथी हमले में कई पुलिसकर्मियों की जान गई थी और हमलावरों ने घंटों तक एक पुलिस चौकी पर कब्ज़ा कर रखा था.
पिछले एक वर्ष में पंजाब के इस इलाक़े में कम से कम चार चरमपंथी घटनाएं हुई हैं जिनमें जान-माल का नुक़सान हुआ है.
बहस का मुद्दा फिर यही है कि पठानकोट-जम्मू हाइवे हमलोें के लिए इतना 'सॉफ़्ट-टारगेट' क्यों रहता है.
राष्ट्रीय राजमार्ग- 44 कहलाने वाला ये हाइवे पठानकोट से होते हुए उधमपुर, अनंतनाग, श्रीनगर और उरी तक जाता है.
पंजाब से लेकर भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर तक जाने वाले इस राजमार्ग से पाकिस्तान की सीमा ज़्यादा दूर नहीं है और कुछ इलाक़ों में सीमा सिर्फ़ छह किलोमीटर दूर है.
दूसरी बड़ी बात ये है कि कश्मीर में भारत-पाक सीमा को, जिसे एलओसी कहा जाता है, कड़ी चौकसी के चलते पार करना मुश्किल है.
शायद इसलिए कथित घुसपैठियों को पंजाब से सटा पाकिस्तान बॉर्डर ज़्यादा रास आता है.
लेकिन आतंरिक मामलों के जानकार अजय साहनी मानते हैं कि इन हमलों को पंजाब से नहीं जोड़ना चाहिए.
उन्होंने कहा, "ये ज़्यादातर हमले उन चरमपंथी गुटों की तरफ से हैं जिनका निशाना कश्मीर है, लेकिन वहां इस तरह के हमलों को अंजाम देना आसान नहीं क्योंकि सुरक्षा का स्तर बहुत ऊँँचा है".
तीसरी गौर करने वाली बात है पठानकोट-जम्मू हाइवे पर भारतीय सेनाओं की मौजूदगी.
इस राजमार्ग के आसपास दर्जनों फ़ौजी ठिकाने हैं और इस राजमार्ग पर फ़ौजी यातायात की भरमार रहती है.
शायद इसलिए भी चरमपंथियों के लिए फ़ौजी ठिकानों पर निशाना साधना आसान हो जाता है.
लेकिन इससे भी बड़ी वजह ये हो सकती है कि किसी फ़ौजी ठिकाने, एयरबेस या पुलिस ठिकानों पर हमले को देश-विदेश की मीडिया में भी भरपूर तवज्जो मिलती है.



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