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इस्लामिक स्टेट अब आतंक का नया साम्राज्य

 भोर हो चुकी थी और पेशमर्गा (मौत से भिडऩे वाला) कुर्दिश लड़ाके पहाडिय़ों के किनारे से ऊपर की ओर चढ़ चुके थे. ठंड अब भी काफी थी. यह उत्तरी इराक में मार्च के दिन थे. आतंकियों के खिलाफ जंग खत्म होने के बाद कुर्दों ने आग जलाकर चाय बनाना और खाना गरम करना शुरू कर दिया था. लड़ाई छोटी लेकिन जोरदार रही थी. आतंकियों की लाशें सड़क किनारे पड़ी हुई थीं. सिर के ऊपर आकाश में अमेरिकी जेट उड़ रहे थे. बीती रात उनकी बमबारी से दहकती रही थी.

पेरिस बताकलां कन्सर्ट हॉल के पास फौरी स्मारक पर श्रद्धांजलि अर्पित करते लोग
यह बात करीब 13 साल पहले की है जब मुझे यह कतई एहसास नहीं था कि मैं अनजाने में ही एक ऐसी लंबी प्रक्रिया के आगाज का गवाह बन रहा हूं जिसने पहले इस्लामिक स्टेट ऑफ सीरिया ऐंड इराक (आइएसआइएस) जैसे संगठन को जन्म दिया और जल्द ही वह एक वैश्विक आतंकी गुट इस्लामिक स्टेट (आइएस) में तब्दील हो गया, जिसकी सबसे ताजा तस्वीर 13 नवंबर को पेरिस पर हुए हमलों में हमें देखने को मिली है.

आइएस का उभारपेरिस के हमले ने अब साफ  कर दिया है कि आइएस दुनिया का सबसे अहम जेहादी गुट बन चुका है-हिंसा के उसके हालिया अतीत के लिहाज से देखें तो यह अल कायदा से भी कहीं ज्यादा आगे निकल गया है और हमले करने में भी बेजोड़ है. महज कुछ हफ्तों के भीतर उसने रूस के एक विमान को सिनाई के रेगिस्तान में गिराकर सैकड़ों लोगों को मार डाला, बेरूत में कई लोगों की हत्या की और पिछले एक दशक का सबसे जानलेवा हमला फ्रांस में किया. अब वह हर मायने में “ग्लोबल” हो चुका है और पहले से चले आ रहे उसके बहुमुखी आतंकी अभियान और मिश्रित बगावत में जुड़ा यह सबसे ताजा आयाम है. जिन देशों में मुसलमान आबादी है, वहां किसी न किसी रूप में यह भी मौजूद है और अफगानिस्तान तथा बांग्लादेश में इसकी ताकत बढ़ रही है. भारत से इराक और सीरिया पहुंचने वालों की संक्चया हालांकि बेहद कम रही है लेकिन इस सफर पर जाने की कोशिश करने वालों की तादाद काफी ज्यादा है. पुलिस ने इनके खिलाफ  मुकदमा नहीं किया है इसलिए वे गिनती में नहीं आते.
आइएस का उभार
इराक में डेढ़ दशक पहले जो समस्या पैदा हुई थी, वह आज आइएस के रूप में इस धरती की सबसे बड़ी समस्या बन चुकी है और जाहिर है, यह गुट यही शक्ल अख्तियार करना चाहता था. इसका लक्ष्य सातवीं से सोलहवीं सदी के बीच इस दुनिया में मौजूद रहे महान इस्लामिक साम्राज्यों की खो चुकी ताकत और चमक को बहाल करना है, उसे मुसलमानों के वैश्विक समुदाय उम्मा तक ले जाना है और उसके बाद नई इस्लामिक महाशक्ति के रूप में खिलाफत की स्थापना करना है. उसका मकसद हैः पैर जमाओ और फैलो. इसीलिए वे ऐसा करने की कोशिश करते रहेंगे और करेंगे. बावजूद इसके, इस परियोजना में एक बुनियादी दिक्कत है. क्या होगा यदि इनका विस्तार रुक जाए?

आतंक की पैदाइश
हलबजा की पहाडिय़ों में 2003 में पनाह लिए आतंकियों के बीच जॉर्डन का एक छोटा-मोटा बदमाश रहा अबू मुसाब अल जरकावी भी था, जो अफगानिस्तान का पुराना लड़ाका था और अपने ही देश में कैद रहा था. अमेरिका पर 9/11 के हमले के बाद उसने अफगानिस्तान के पश्चिम में स्थित अपना शिविर छोड़ दिया जिसे आंशिक तौर पर ओसामा बिन लादेन और अल कायदा से मदद मिलती थी. वह उत्तरी इराक चला गया, जहां उसे उन इस्लामिक आतंकियों के गढ़ में पनाह मिल गई, जो सद्दाम हुसैन और स्थानीय कुर्दों के खिलाफ इस संकल्प के साथ जंग छेड़े हुए थे कि एक दिन वे इस लड़ाई को पश्चिम तक लेकर जाएंगे. कुछेक सौ में से अधिकतर लड़ाके जंग के बाद पहाड़ों में भाग गए और घूम-फिर कर वापस इराक आ गए. अल जरकावी भी इन्हीं में एक था. सद्दाम के पतन के कुछ महीनों के भीतर ही उसने वहां फैली अराजकता का फायदा उठाकर एक नया गुट बना लिया, जिसे बाद में अल कायदा के साथ विलय करके आइएसआइएस की नींव रखी जानी थी.

बताकलां कन्सर्ट हॉल में हमले के बाद घायलों की मदद करते फ्रांसीसी दमकलकर्मीअमेरिका ने इराक पर हमला सद्दाम के तथाकथित जनसंहारक हथियारों को खत्म करने के नाम पर किया था ताकि दुनिया को सुरक्षित किया जा सके. उसका परिणाम हालांकि उल्टा हुआ. इस कार्रवाई ने इस्लामिक जगत के केंद्र में एक और मोर्चे को जन्म दे डाला. यहां बगावत हो गई जिसमें इस्लामिक लड़ाकों ने केंद्रीय भूमिका निभाई, भले ही वे अक्सर उतने असरदार न रहे हों.
बताकलां कन्सर्ट हॉल में हमले के बाद घायलों की मदद करते फ्रांसीसी दमकलकर्मी

अल जरकावी की 2006 में मौत हो गई. उसे पश्चिमी इराक के सुन्नी कबीलों ने अपने मजबूत गढ़ से बाहर फेंक दिया था. वे भले ही शिया वर्चस्व वाली नई सत्ता से हताश थे, लेकिन अल जरकावी की अराजक हिंसा और अपनी परंपराओं के अपमान से भी वे आजिज आ चुके थे. आने वाले दिनों में इराक के इस्लामिक लड़ाकों को काफी नुक्सान उठाना पड़ा, जो इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक (आइएसआइ) के बैनर तले लड़ रहे थे. उनके सारे आला नेता 2010 में सिलसिलेवार छापों के दौरान मारे गए. इसके बाद उनका एक नया मुखिया नियुन्न्त हुआ अबू बक्रअल बगदादी. यह 40 साल का एक मौलवी था और बगदाद के उत्तर में स्थित सामर्रा शहर का लड़ाका था. इस संगठन में फैसले लेने वाले लोग वे थे जो सद्दाम के राज में अधिकारी रह चुके थे.

यह गुट अल कायदा के प्रति अब भी थोड़ा-बहुत वफादार बना हुआ था लेकिन 2011 में उसके सामने एक असामान्य अवसर आया. इराक में बढ़ते जातीय तनावों ने उसके लिए खुराक का काम किया. समूचे इस्लामिक जगत की तरह यहां भी शिया और सुन्नी के बीच के अंतर्विरोध पिछले दशक में तीखे होते गए थे. शिया दुनिया भर में सिर्फ 15 फीसदी हैं लेकिन इराक में वे बहुसंख्यक हैं और सद्दाम के पतन के बाद वहां की सत्ता, नौकरशाही और फौज पर उन्हीं का वर्चस्व था. सद्दाम खुद सुन्नी थे और उन्होंने अपने समुदाय को लाभ पहुंचाया था.

खासकर 2009 के बाद से इराकी प्रधानमंत्री नूर अल मालिकी ने शियाओं के हक में जो पक्षपातपूर्ण नीतियां बनाईं, उनके चलते कई सुन्नी तत्कालीन आइएसआइ को समर्थन देने लगे थे. दूसरी ओर सीरिया और अरब वसंत से प्रभावित अन्य देशों में आम नागरिकों के बुनियादी मानवाधिकारों की मांग के चलते हुए उनके भीषण दमन के बाद भड़के गृहयुद्ध ने देश के पूर्वी क्षेत्र में सत्ता के लिए एक जगह खाली कर दी थी. यहां भी सत्ताएं मोटे तौर पर कट्टरपंथी ही थीं. मसलन, असद का शासन अलवियों की हिमायत करता है जो सीरिया में शिया अल्पसंख्यकों के एक समुदाय के तौर पर गिने जाते हैं. इसे मुख्य समर्थन शिया बहुल ईरान से मिलता है. बाकी अधिसंख्यक आबादी और तकरीबन समूचा विपक्ष सुन्नी है जिसे सुन्नी सत्ताओं जैसे कतर, तुर्की और सऊदी अरब का समर्थन हासिल है. नतीजा एक जबरदस्त विभाजन को जन्म दे रहा था और जिस किस्म की अराजकता आसन्न थी, उसका दोहन करने के लिए आइएसआइ तैयार बैठा था.

ओसामा के मारे जाने के बाद अयमान अल जवाहिरी के नेतृत्व वाले अल कायदा के स्थानीय धड़े की भूमिका निभाते हुए आइएसआइ ने सीरिया में एक नया संगठन बनाने में कामयाबी हासिल की. अल बगदादी को लगा कि उसे वहां खुद सीधी कार्रवाइयों में हिस्सा लेना चाहिए. तब जाकर उसने अपने गुट का नाम बदलकर इस्लामिक स्टेट ऑफ  इराक ऐंड सीरिया (आइएसआइएस) कर डाला और सबकी कमान अपने हाथ में ले ली. अल जवाहिरी ने उसे इराक तक सीमित रहने को कहा लेकिन उसने इनकार कर दिया और इस बुजुर्ग नेता को ऐसे शब्दों से बेइज्जत किया जैसा शायद ही कभी जेहादी नेताओं के बीच हुआ रहा होगा.

यह टकराव सिर्फ शख्सियतों का नहीं था. यह विश्वदृष्टि और रणनीति का भी टकराव था. अल कायदा खिलाफत की स्थापना को एक दीर्घकालिक लक्ष्य के रूप में देखता था. आइएसआइएस उसे तात्कालिक परियोजना के रूप में देखता था. अल कायदा एक वैश्विक रणनीति के पक्ष में था जिसके तहत पश्चिम पर हमला करके इस्लामिक आतंक की ताकतों को एक करना था और “क्रूसेडर जायोनिस्ट” के गठजोड़ को इस प्रक्रिया में कमजोर करना था. इसके उलट आइएसआइएस इलाकों और लोगों को तरजीह देता था.

मिस्र में कथित तौर पर आइएस के बम से गिराए गए रूसी विमान के दुर्घटनास्थल पर श्रद्धांजिल देता एक शख्स“ राज्य” की स्थापना
इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि 2013 के आरंभ में ही आइएसआइएस ने सीरिया में जबरदस्त धमाकेदार शुरुआत की, जमीन के बड़े हिस्से पर कब्जा जमा लिया, ढेर सारे हथियार और संसाधन जुटा लिए और लाखों लोगों को अपने  कठोर शासन के तहत ला दिया. उन्हें इस प्रक्रिया में लडऩे का बहुमूल्य तजुर्बा भी हासिल हुआ और इसकी समझ बनी कि जातीय, सांप्रदायिक, आर्थिक और कबाइली मतभेदों का दोहन करके कैसे समुदायों पर नियंत्रण हासिल किया जाता है. इस नई क्षमता और ज्ञान का इस्तेमाल जून 2014 में इराक में हुआ. इस गुट ने मोसूल पर कब्जा जमा लिया. अल बगदादी ने दो हफ्ते बाद खिलाफत का ऐलान कर दिया.

स्वयंभू खलीफा इब्राहिम की पदवी संभालने के बाद अल बगदादी ने ऐसे सिलसिलेवार निर्देश जारी किए जिनसे एक झलक मिलती है कि उसकी खिलाफत का स्वरूप असल में कैसा होगा. सबसे पहले खिलाफत की नई राजधानी मोसूल के निवासियों के निजी आचार से संबंधित आदेश जारी किए गए. पिछले साल रक्का जैसी जगहों पर लागू नियमों से ये मेल खाते थे. इसके अलावा उन नियमों को भी लागू किया गया जो अल जरकावी के राज में पश्चिमी इराक में लागू थे, तालिबान शासित अफगानिस्तान में लागू थे और अतीत के उन विभिन्न इस्लामिक राज्यों में लागू थे जिन्हें पिछली सदियों और दशकों के दौरान हर किस्म के पुरातनपंथियों ने स्थापित करने की कोशिश की थी. धूम्रपान और शराब पीना वॢजत था. धूम्रपान करने पर हाथ-पैर काटने का दंड था. शराब पीने पर मृत्युदंड लगाया गया. औरतों को सिर्फ हिजाब में रहना था और घर से बाहर सिर्फ अपने पति या करीबी रिश्तेदार के साथ ही निकलने की छूट थी. स्कूलों को आदेश दिया गया कि वे शिक्षकों और छात्रों के बीच कड़ाई से लैंगिक विभाजन बरतें. पुरुषों को दिन में नियम से पांच बार नमाज पढऩे का आदेश था और ऐसा न करने पर कोड़े बरसाने का दंड था. मोसूल का गश्त लगाने वाली जिस मजहबी पुलिस की स्थापना की गई, वह रक्का, फल्लूजा, तालिबान शासित अफगानिस्तान और समकालीन सऊदी अरब की पुलिस से मेल खाती संस्था है.
मिस्र में कथित तौर पर आइएस के बम से गिराए गए रूसी विमान के दुर्घटनास्थल पर श्रद्धांजिल देता एक शख्स
इसके बाद हत्याओं का दौर शुरू हुआ. सबसे पहले मरने वालों में मोसूल के वे मौलवी रहे जिन्होंने इस्लामिक स्टेट की फरमाबरदारी से इनकार कर दिया. शहर भर में ये हत्या पतझड़ और सर्दियों के दौरान जारी रहीं. जनवरी 2015 में अकेले एक महीने में चार डॉक्टरों को इसलिए मार दिया गया क्योंकि उन्होंने आइएस के लड़ाकों का इलाज करने से इनकार कर दिया था, दो समलैंगिकों को शहर के बीचोबीच जुटी भीड़ के सामने एक ऊंची मंजिल से धकेल दिया गया और एक औरत को व्यभिचार के आरोप में पत्थरों से मार डाला गया. खुद आइएस के दो लड़ाकों को पहले सूली पर चढ़ाया गया और फिर गोली मार दी गई, क्योंकि उन पर चौकी पर वसूली का आरोप था. खिलाफत की स्थापना के बाद मोसूल में हुई अधिकतर हत्याएं उन कबाइलियों की थीं जिन्होंने सरकारी ताकतों के साथ मेल-जोल करके इस्लामिक स्टेट को धोखा दिया था.

जैसा कि तालिबान शासित अफगानिस्तान में था, सार्वजनिक तौर पर बर्बर हिंसा करने का लक्ष्य जनता को कानूनों में बांधे रखना था. वे मानते थे कि इंसाफ  होता है तो दिखना भी चाहिए. ऐसी हिंसा का लक्षित दर्शक तीन तरह का था और हरेक के लिए उसका संदेश अलग-अलग था. आइएस का विरोध करने वालों के लिए लक्ष्य यह था कि बर्बर हिंसा के जरिए उन्हें आतंकित किया जा सके. आइएस के समर्थकों के लिए यह हिंसा उन्हें एकजुट करने का साधन थी. जो लोग अब भी भ्रम में थे और अपना पक्ष तय नहीं कर पा रहे थे, यह हिंसा उन्हें पाला चुनने को बाध्य करती थी ताकि देखने वाला या तो हिंसा के नजारे पर चुप रहकर उसे मौन सहमति दे डाले या फिर उसका विरोध कर दे.

सभी सत्ताओं की तरह आइएस को भी पैसों की जरूरत है. नए कट्टरपंथी इस्लामिक राज्य की स्थापना के मामले में आइएस पूर्ववर्ती पहल से इस मामले में नाटकीय रूप से भिन्न है कि उसकी कार्रवाइयों का स्तर वृहद् है, उसके कब्जे वाले इलाके विशाल हैं और उसके पास अपार संसाधन मौजूद हैं. इसका मतलब यह हुआ कि अपने राज में जी रहे लाखों लोगों की जिंदगियों को प्रशासित करने की उसकी क्षमता पूर्ववर्ती किसी भी गुट के मुकाबले कहीं ज्यादा है. इसका एक और मतलब यह हुआ कि वह अपने प्रचार तंत्र पर ज्यादा पैसा खर्च कर सकता है (जाहिर है, पिछले दो या तीन दशकों के दौरान अस्तित्व में आए आतंकी संगठनों के मुकाबले उसका खर्चा भी कहीं ज्यादा है).
27 वर्षीय अब्देलहामिद अबाऊद पेरिस हमले का मास्टरमाइंड बताया जाता है

27 वर्षीय अब्देलहामिद अबाऊद पेरिस हमले का मास्टरमाइंड बताया जाता हैनकद की आमद
आइएस को कई स्रोतों से पैसा मिलता है. पीछे देखें तो इस्लामिक जगत में मौजूद कई निजी दानदाता आतंकी गुटों को पैसे देते रहे हैं. गुप्तचर संगठनों का मानना है कि आज ये लोग संगठन के अनुदानों में छोटी भागीदारी रखते हैं. व्लादीमिर पुतिन या दूसरे लोग चाहे जो दावा कर लें, लेकिन आजकल इनके अनुदान दूसरे देशों से नहीं आते बल्कि उसका मुख्य स्रोत स्थानीय स्तर पर लगाए गए कर और उनके कब्जे वाले इलाकों में स्थित तेल के मैदानों और रिफाइनरी से होने वाली तेल की बिक्री है.
आइएस ने दुनिया में जैसे-जैसे अपना विस्तार किया है, उतनी ही सावधानीपूर्वक उसने आकर्षक संसाधनों पर कब्जा जमाने को भी प्राथमिकता में रखा है. जाहिर है, सबसे बड़ा संसाधन तेल है और पूर्वी सीरिया तथा इराक के अधिकतर तेल मैदान आइएस के नियंत्रण में हैं. अधिकांश का इस्तेमाल घरेलू उपभोग के लिए किया जा रहा है, लेकिन कुछ हिस्से की बिक्री पुराने तस्करी के रास्तों से हो रही है, खासकर उत्तरी इराक के कुर्द आबादी वाले इलाकों के रास्ते तुर्की और आइएस नियंत्रित क्षेत्रों में यह तेल जा रहा है. बाजार मूल्य के पांचवें हिस्से पर तेल बेचे जाने के बावजूद माना जाता है कि 2014 की गर्मियों में इससे हर महीने 4 करोड़ डॉलर से ज्यादा की आमदनी हुई होगी. यह संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है. इसके अलावा उन आपराधिक गिरोहों के माध्यम से गेहूं, कपास और प्राचीन वस्तुओं की तस्करी से भी भारी पैसा बनाया जा रहा है जो आइएस के अधिकारियों से इस माल को निकालने और ले जाने का “लाइसेंस” प्राप्त करते हैं. इन सबके अतिरिक्त बंधकों की फिरौती से ही माना जाता है कि करोड़ों डॉलर की आमद हुई है.

राजस्व के स्रोतों में सबसे अहम वे कर हैं जो स्थानीय कारोबारों और व्यक्तियों पर लगाए जाते हैं. कुछ तो परंपरागत कर हैं, जैसे धर्मार्थ कार्यों पर 2.5 फीसदी का कर, जो इराक और सीरिया के पूर्ववर्ती शासनों द्वारा लगाए गए करों के मुकाबले कम कष्टकर हैं. इसके अलावा उन थोड़े-बहुत सरकारी कर्मचारियों के वेतन पर भी कर लगाया जाता है, जिन्हें दमिश्क और बगदाद के राजकोष से भुगतान होता है. ये सब मिलाकर रोजाना दस लाख डॉलर के आसपास की रकम बनती है, हालांकि विश्वसनीय आंकड़े प्राप्त करना कठिन है. कुछ अन्य कर उतने व्यवस्थित नहीं हैं लेकिन उनसे आने वाला राजस्व भारी है. ऐसे कर वसूली के रूप में लिए जाते हैं जिनके न चुकाए जाने पर हिंसा की धमकी दी जाती है लेकिन अगर ये पैसे चुका दिए गए तो आइएस की ओर से यह आश्वासन रहता है कि वह कारोबारों और व्यन्न्तियों की चोरों, डकैतों और अन्य वसूली गिरोहों से सुरक्षा भी करेगा. अमेरिकी अधिकारियों और दूसरों का अनुमान है कि मोसूल के पतन से पहले ही इस शहर के बाशिंदे आइएस को हर महीने 80 लाख थे 1.2 करोड़ डॉलर का भुगतान कर रहे थे. उन ट्रकों और निजी कारों से भी शुल्क लिया जाता है जो सीरिया और इराक से गुजरते हैं.

सवाल उठता है कि इतने सारे पैसे का आइएस करता क्या है? जवाब अंदाजन सही है कि वह वही करता है जो इंकलाबी एजेंडे वाले तमाम प्रतिगामी राज्य करते रहे हैः प्रशासनिक व सामाजिक सेवाओं समेत फौज को वित्तपोषण तथा तमाम किस्म की ऐसी शैक्षणिक और सांस्कृतिक पहलों को अनुदान जिनका उद्देश्य शासित लोगों के मूल्यों, कसौटियों और नजरिए को अपने हिसाब से गढऩा होता है.

आइएस जंग में भी पैसा लगाता है. एक बार में आइएस जितने लड़ाकों को तैनात कर पाने में समर्थ है, उनकी संख्या दसियों हजार तक जाती है. सितंबर 2014 में सीआइए ने कथित तौर पर अनुमान लगाया था कि यह संख्या 20,000 से 31,500 तक जा सकती है. अधिकतर लड़ाकों को हर माह 200 से 600 डॉलर का भुगतान किया जाता है यानी इन पर होने वाला कुल भुगतान 40 लाख से 2.1 करोड़ डॉलर बैठता है जिसमें खाने-पीने और रहने का खर्च अतिरिक्त है.

हथियार इनके मौजूदा जखीरे से आते हैं जिन्हें इराक और सीरिया के सरकारी बलों से छीना गया है. इनकी कोई कमी नहीं दिखती. विदेशी लड़ाके भी अब आइएस के पास हैं जिनकी संख्या 30,000 के आसपास है. इनमें बड़ी संख्या यानी करीब दो-तिहाई पश्चिमी एशिया से हैं. इनके अलावा फ्रांस से 1,500 और बेल्जियम से शायद 500 लड़ाके आए हैं, बावजूद इसके कि वहां मुसलमानों की आबादी काफी छोटी है. कुछ मुट्ठी भर लड़ाके भारत, मालदीव और दक्षिण एशिया के अन्य देशों से भी हैं. इन्हें आगे की पंक्तियों में गोली खाने के लिए रखा जाता है, फिदायीन बनाया जाता है.

आइएस के कब्जे में पत्रकार स्टीवन सॉत्लॉफ की तस्वीरकैसे लड़ा जाए
आइएस ने 2014 की गर्मियों के बाद से अपने पैर फैलाए हैं. इस साल की शुरुआत में इसने रमादी और पालमीरा पर कब्जा कर लिया था. इसे कुछ जगहों पर नुक्सान भी हुआ, जैसे इराक के बैजी और तिकरित में इसे नुक्सान झेलना पड़ा. सीरिया के सीमावर्ती कस्बे कोबानी में इसके 5,000 लड़ाके मारे गए. अब सिंजर में भी इसे नुक्सान उठाना पड़ रहा है. इन तमाम जगहों पर इसकी हार हुई है. फिलहाल रणनीतिक गतिरोध की हालत है जिसमें इसके हाथ से बाजी फिसलकर इसके बिखरे हुए शत्रुओं के हाथों में जा रही है.

एक अहम कारक क्षेत्रीय ताकतों का ताजा संकल्प है, खासकर तुर्की का, जिसने अपनी दक्षिणी सीमा पर मौजूद सशस्त्र कुर्द लड़ाकों से असहमति के बावजूद सीरिया की अपनी सीमा को बंद कर दिया है और आइएस को जाने वाले संसाधन रोक दिए हैं. इराक ने शिया लड़ाकों से युक्त इराकी मिलिशिया को संगठित कर लिया है जिसने पूर्वी मोर्चे पर आइएस को सीमित कर दिया है. तेहरान समर्थित हिजबुल्ला ने भी असद शासन के लड़ाकों को मजबूती दे दी है. रूसी हवाई हमले दमिश्क को मजबूत करने पर केंद्रित रहे हैं और उसने विपक्ष के नरमपंथी धड़ों को ज्यादा निशाना बनाया है. पेरिस पर हमले के बाद यह सूरत बदल सकती है.

यह साफ नहीं है कि पेरिस पर हमलों के लिए यह वक्त क्यों चुना गया. पश्चिम की गुप्तचर एजेंसियों को लंबे समय से इसका डर था. आइएस ने पहले तो इराक और सीरिया में पश्चिमी लोगों को मारा और उसका वीडियो बनाकर प्रचार किया. इसके बाद उन्होंने पश्चिमी एशिया में हर जगह पश्चिम के लोगों को मारा, संग्रहालयों और होटलों पर हमला किया और आखिरकार एक विमान को गिरा दिया. अब उन्होंने पश्चिम में घुसकर पश्चिम के लोगों की हत्या कर दी है.

पेरिस के निशाना बनने की आशंका हमेशा से थी. फ्रांस 9/11 के बाद अल कायदा के आतंक से साफ-साफ इसलिए बच निकला था क्योंकि उसने इराक में अमेरिकी हमले का विरोध किया था. धर्मनिपेक्षता का प्रतीक माना जाने वाला यह देश हिजाब पहनने जैसे मसलों पर जिस तरह कठोरता से पेश आया, या फिर हाल ही में आइएस या अन्य कट्टरपंथी गुटों के खिलाफ  सैन्य पहलों का अगुआ बना, इसके चलते उसे निशाना बनाया गया. इससे पहले 2012, 2013 और 2014 में भी फ्रांस में हमले हुए हैं. जनवरी में शार्ली एब्दो पर हुआ हमला इस सिलसिले में ताजा था. पेरिस का हमला इस मामले में गुणात्मक रूप से भिन्न है. यह इस बात का संकेत भी है कि दूसरे देश भी निशाने पर हैं, अकेले पश्चिमी यूरोप नहीं. इस त्रासदी की कामयाबी आतंकियों का मनोबल बढ़ाएगी और वे ऐसे ही और हमले करेंगे. दक्षिण एशिया बेशक बड़ा निशाना है और भारत आतंकियों के लिए आकर्षक स्थल है.

पिछली जुलाई में अमेरिकी फौज के प्रमुख ने अवकाश प्राप्ति से पहले कहा था कि आइएस के खिलाफ जंग दो या तीन साल का मामला नहीं है बल्कि इसमें “दस से बीस साल का वक्त लगेगा.” अगर अल बगदादी मारा गया, तो ऐसा जल्द हो सकता है. हवाई हमलों से त्रस्त होकर आइएस अपने कब्जाए इलाकों को ही बचाने में लगा रह सकता है.

पश्चिमी फौजों के अब जंग में उतरने की गुंजाइश कम है. इसकी बजाए जेट, विशेष बल और स्थानीय टुकडिय़ां ही केंद्र में होंगी. पिछले दशक ने साबित किया कि भले अमेरिका की एक हथियारबंद डिविजन इराक या सीरिया को आइएस से खाली करा दे, लेकिन इलाके में उनकी मौजूदगी विनाश का कारण बनी रहेगी. पश्चिम अब असद को भी समर्थन नहीं देने वाला है. तीसरे विकल्प की खोज में कूटनीतिक कवायदें तेज हो चली हैं जिससे असद समर्थक और असद विरोधी अंतरराष्ट्रीय धड़ों को एक साथ संतुष्ट किया जा सके. पेरिस में हुए हमलों ने वाशिंगटन, मॉस्को, अंकारा, रियाद और दिल्ली के बीच सहमति बनाने का काम किया है.
आइएस के कब्जे में पत्रकार स्टीवन सॉत्लॉफ की तस्वीर
तथाकथित खिलाफत की स्थापना के लिए लगातार विस्तार जरूरी है. अगर फतह की रक्रतार मद्धिम पड़ी, तो अल बगदादी और उनके साथियों का बनाया माहौल भी ठंडा पड़ेगा और सारा साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा. ऐसा हो, इससे पहले हमें शायद और हिंसा देखनी पड़े. शायद इस्लामिक जगत में और उसकी सरहदों के पार हमें और लाशों का गवाह बनना पड़े.

(जेसन बर्क द गार्डियन के विदेश संवाददाता हैं और द न्यू थ्रेट के लेखक हैं)


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